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किसने शुरू किया पहला विश्व युद्ध

किसने शुरू किया पहला विश्व युद्ध

भले ही पहले विश्व युद्ध को 100 साल पूरे हो रहे हैं लेकिन बुनियादी सवाल अभी भी उलझा हुआ है. आखिर प्रथम विश्व युद्ध किसने शुरू किया.


जानकार और इतिहासकार इस मामले में नए तथ्यों को सामने ला रहे हैं. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की कनाडाई प्रोफेसर मार्गरेट मैकमिलन का कहना है, "यह ऐसा दुर्दांत युद्धथा, हमारा सहज मानव स्वभाव है कि इसके लिए किसी पर इलजाम लगाया जाए." उन्होंने किताब लिखी है, 'पहला विश्व युद्ध, जिसने शांति खत्म कर दी'.

युद्ध खत्म होने के बाद 1919 में वरसाई की संधि में जर्मनी को युद्ध का जिम्मेदार बताया गया और इसके लिए बर्लिन पर बंदिशें लगाई गईं. लेकिन 1920 से ही माना जाने लगा कि इस युद्ध के लिए "सभी जिम्मेदार थे, या कोई नहीं". जर्मनी के इतिहासकार फ्रित्ज फिशर ने 1961 में एक किताब लिखी और जर्मनी के लोगों की खूब नाराजगी झेली. उन्होंने किताब में लिखा कि निश्चित तौर पर जर्मनी को ही इसका दोषी समझना चाहिए. उन्होंने लिखा कि 1914 में जर्मन प्रशासन युद्ध शुरू करना चाहता था. उनका तर्क है कि ऐसी ही परिस्थितियों में दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत भी जर्मनी नेहीकीथी.

उनके इस तर्क का काफी बरसों तक सम्मान किया जाता रहा लेकिन हाल के बरसों में इतिहासकारों ने उनके तर्क पर सवाल उठाने शुरू किए हैं. उनका कहना है कि कई देश इसके लिए जिम्मेदार थे और उनका क्रम कुछ इस तरह थाः जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, रूस, सर्बिया, फ्रांस और ब्रिटेन.

साल 2012 में आई किताब ने इस मुद्दे को फिर सुलगा दिया. ऑस्ट्रिलेयाई इतिहासकार क्रिस्टोफर क्लार्क की किताब द स्लीपवॉकर्स में दावा किया गया है कि जून 1914 में ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई राजकुमार की सारायेवो में हत्या किया जाना ही युद्ध की शुरुआत की इकलौती वजह नहीं थी. उनका कहना है कि यह बाल्कन युद्ध का नतीजा था, जो 1912 और 1913 में हुआ था. हालांकि उस युद्ध में ऑस्ट्रिया-हंगरी ने हिस्सा नहीं लिया था. युद्ध के बाद ही उस्मानिया शासकों को यूरोप खाली करना पड़ा था.

उन्होंने लिखा है कि प्रथम विश्व युद्ध "अगाथा क्रिस्टी का ड्रामा" नहीं था, "इसमें धुआं छोड़ती बंदूकें नहीं थीं, बल्कि ये बंदूकें हर किसी के हाथ में थीं." प्रकाशन के बाद से ही यह किताब जर्मनी में खूब बिकी है. जर्मनी के इतिहासकार गेर्ड क्रुमिष का हालांकि कहना है, "क्लार्क ने कुछ बातों को नजरअंदाज कर दिया. मिसाल के तौर पर ऑस्ट्रिया चाहता था कि सर्बिया के खिलाफ युद्ध हो और उस स्थिति में जर्मनी यह देखना चाहता था कि क्या रूस भी युद्ध के लिए तैयार है." उनका कहना है, "1914 में जर्मनों ने बटन दबाया, फ्रांसीसियों ने नहीं, और न ही रूसियों ने."

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के इतिहासकार सोएन्के नीटजेल का कहना है कि वह क्लार्क की बातों से इत्तेफाक रखते हैं कि सिर्फ जर्मनी ही युद्ध के लिए जिम्मेदार नहीं था.

हालांकि प्रथम विश्व युद्ध से पहले भी यूरोप में खूब लड़ाइयां हुईं लेकिन वो इतनी बड़े युद्ध में नहीं बदलीं. वजह यह थी कि नेता वहां तक नहीं जाते थे. मैकमिलन का कहना है, "लेकिन इस संकट ने एक दागदार विरासत छोड़ दी. लोगों ने शायद सोचा कि हमारे सामने तो पहले भी संकट आया था और हम उससे निपटे थे. लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि जो नेता पहले पीछे हट जाया करते थे, उन्होंने तय कर लिया था कि इस बार वे नहीं हटेंगे."

वह कहती हैं, "रूस के मामले में यह बात सही साबित होती है, 1908 में बोस्नियाई युद्ध के दौरान वह पीछे हट गया था. 1912 और 1913 में सर्बियाई युद्ध के दौरान भी वह हट गया था और मैं समझती हूं कि उन्होंने सोचा कि अगर वे फिर से पीछे हटे, तो उन्हें बड़ी शक्ति नहीं माना जाएगा."

उनका कहना है कि मामला तब गड़बड़ा गया, जब ऑस्ट्रिया-हंगरी ने जुलाई 1914 में सर्बिया को नष्ट करने का फैसला कर लिया और उन्हें जर्मनी की तरफ से समर्थन मिल गया. उनका कहना है, "हम जिम्मेदारी तय कर सकते हैं लेकिन किसी एक पर इसका इलजाम नहीं लगा सकते."

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