शिवत्व का जागरण है कांवड़ यात्रा
शिवमूर्ति-पूजा की अपेक्षा शिवलिंग की पूजा का अधिक महत्व है, क्योंकि शिवलिंग साक्षात् शिव का पद प्राप्त कराने वाला है। शिव अन्य देवताओं की अपेक्षा शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिए वे आशुतोष कहलाते हैं। रुद्राभिषेक का धार्मिक और दार्शनिक महत्व यही है कि पौराणिक द्वादश ज्योतिर्लिगों में से किसी एक का भक्ति भाव से गंगाजल से अभिषेक करने पर शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
शिव पुराण में द्वादश ज्योतिर्लिगों के दर्शन, अभिषेक का विशद वर्णन है। संत तुलसीदास भी श्रीरामचरितमानस में रुद्राभिषेक का महत्व बतलाते हुए लिखते हैं कि जो मनुष्य गंगाजल लाकर भक्ति भाव से रामेश्वर शिव पर चढ़ाएगा, वह मुक्ति प्राप्त करेगा। कांवड़ यात्रा कोई धार्मिक रीति-रिवाज और कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि शिवत्व के जागरण का उद्घोष है। श्रवण का महीना शिव की आराधना का महीना है। इस मास में शिवरात्रि के दिन रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व है। इसी कारण श्रवण मास के लगते ही देश के कोने-कोने से शिवभक्त गंगाजल लाने के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश, नीलकंठ, गोमुख आदि तीर्थों के लिए निकल पड़ते हैं। वहां पतितपावनी गंगा की धारा में डुबकी लगाते हैं और पवित्र गंगाजल कांवड़ों में रख कर 'बम-बम भोले' के जयकारे लगाते हुए कांवड़ों को कंधे पर रख कर अपने-अपने गंतव्य की ओर चल पड़ते हैं।
कांवड़ यात्रा कठिन परिस्थितियों में भी संयमित रहने व हार न मानने की प्रेरणा देती है।
शिव ने देवों के कल्याण हेतु विष पिया और उन्हें अमृत पिलाया। शिव के चरित्र से शिक्षा मिलती है कि दूसरों की भलाई करते रहना चाहिए। इसी शिक्षा में कांवड़ की सार्थकता है।
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