घुटने का मांस फटना या ऑस्टियोपोरोसिस....!
ऑस्टियोपोरोसिस एक ऐसे खामोश बीमारी है जो कि धीरे-धीरे शरीर की हड्डियों को कमजोर करने लगती है। इसमें हड्डियों का मास घटने लगता है और हड्डियों में मौजूद छोटे-छोटे उत्तक फटने लगते हैं। इस प्रकार हड्डियों में फ्रैक्चर होने का खतरा लगातार बना रहता है। वैसे अधिकतर ये उम्रदराज महिलाओं में पाया जाता है। हालांकि बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि ऑस्टियोपोरोसिस की शुरुआत जीवन में बहुत पहले ही हो जाती है, लेकिन परिणाम देर से दिखते हैं। इसीलिए यह सुझाया जाता है कि हमें शुरुआत से ही अपने आहार का ध्यान रखते हुए कैल्शियम व विटामिन डी का सेवन अधिक करना चाहिए।
मॉडन जमानें में हर किसी को मॉडन दिखने की चाहत बनी रहती है। जिसका असर अधिकांश महिलाओं पर देखा जा रहा है चूंकि वे हर तरह के फैशन को अपनाती है जैसे हाई हील्स। इसका उपयोग वे अपने दैनिक जीवन में करती रहती है। जिससे महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या दोगुनी तेजी से बढ़ती जा रही है। हील्स जितनी ऊंची होती है उतना ही पैर के अंदर प्रेशर बढ़ता है। करीबन 3 इंच की हील्स पहनने से पंजे पर पड़ने वाला दवाब 76 फीसदी तक बढ़ जाता है। इससे वॉइंट अंजरी और घुटने के ऑस्टियोपोरोसिस होने की आंशका बढ़ जाती है। इस तरह की समस्या में आमतौर पर रोगी न तो पीठ सीधी करके खड़ा हो सकता है और न ही तनकर या खड़ा हो सकता है। वह न ही रोजमर्रा का कोई काम कर सकता है। समस्या और अधिक बढ़ जाने पर न सिर्फ ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों का कमजोर पड़ जाना) जैसी बीमारियां जन्म लेती हैं। बल्कि रोगी के लिए मामूली सी चोटों से निजात पाना भी मुश्किल हो जाता है।
प्राय: इसकी शुरुआत हल्के दर्द से होती है। खासकर कमर और गर्दन की हड्डियों, मांसपेशियों में दर्द होता है।बाद में अचानक से दर्द शुरु होने लगता है। प्रभावित भागों में दबाव पड़ते ही दर्द शुरु हो जाता है। यह दर्द हफ्तों से लेकर महीनों तक रह सकता है। कहीं भी गिरने या हल्की सी चोट लगने से भी फ्रे क्च र हो जाता है। कभी-कभी शरीर का पोश्चर भी खराब हो जाता है। अगर आप का मेनोपोज हो चुका है और आप को अक्सर अपनी हड्डियों और मांसपेशियों में दर्द महसूस होता है जो कि बर्दाश्त से बाहर हो जाता है या आप को उठने बैठने में भी तकलीफ होती है तो आप को तुरंत डाक्टर से संपर्क करना चाहिए।
हमें चलते समय अपनी प्राकृतिक व आरामदायक गति से ही चलना चाहिए न कि किसी अन्य व्यक्ति की तुलना करते हुए। वजन घटाने के लिए जॉगिंग के साथ तीव्र गति की चाल एक बेहतर आइडिया है, जब कि हृदय रोगी व फेफड़े के रोगियों को इस तरह की कोई क्रिया करने से पहले अपने कार्डियोलोजिस्ट या पुल्मोनोलोजिस्ट से सलाह ले लेनी चाहिए। वृद्ध रोगी जो आर्थराइटिस से पीड़ित हों उन्हें आरामदायक पैड वाले जूते पहनने चाहिए और ऐसी सतह पर चलना चाहिए जहां पर कार्पेट न हो। ऐड़ियों में दर्द के मरीजों को ऐसे जूते पहनने चाहिए जिसके अंदर कुशन हील पैड लगा हो। न्यूरोपैथी व डायबिटींज के मरीजों को सिलिकोन के सोल के लैस जूते पहनने चाहिए। जिनके पैर व अंगूठे पर घाव हो या पैरों की अंगुलियों की बनावट ठीक न हो तो उन्हें अतिरिक्त पैड वाले जूते पहनने चाहिए। जूते व फुटवीयर या स्नीकर्स को ठीक से रखना चाहिए व समय-समय पर जैसे ही कोई परेशानी हो बदल देना चाहिए। चलने से पहले शरीर व पैरों को खींचना व लंबी-लंबी सांसें लेना एक बेहतर विकल्प है। सीधी सतह पर चलते समय अपने सिर व शरीर को एकदम सीधा रखें। आप की चाल बिल्कुल संतुलित होनी चाहिए, आप के चेहरे और कंधे के बीच एक वर्ग बनना चाहिए और आप का एक पंजा दूसरे के पीछे चलना चाहिए। रैम्प पर चलने से घुटनों पर ंजोर पड़ता है जिससे अधिक कैलोरी नष्ट होती है। इस लिए आर्थराइटिस के मरीजों को रैम्प चाल से बचना चाहिए। एक दिन में दो या तीन किमी। चलना अच्छी आदत है। सीधे चलने से पैरों क ी निचली हड्डियों और मांसपेशियों पर भी धीरे-धीरे दबाव पड़ता है तो वे भी मजबूत हो जाती हैं। जो लोग घुटने में आर्थराइटिस से पीड़ित हों उनके लिए चलना एक अच्छा व्यायाम है। जब कि ऐसे लोगों को स्थिर रूप से खड़े होने के लिए या चलने के लिए बैसाखी की भी जरूरत पड़ती है। दर्द वाले घुटने के उल्टे हाथ में बैसाखी को पकड़ना चाहिए।
चलने से एड़ी में हो रही गति से नाड़ी संबंधी घुमाव पर प्रभाव पड़ता है। हड्डियों व मांसपेशियों पर दबाव पड़ने से इसकी मजबूती व गुणवत्ता और बेहतर होती है। मांसपेशियां दबाव पड़ते ही चलायमान बनती हैं जिससे ऑस्टियोपोरोसिस ठीक हो सकता है। दरअसल मेटाबोलिंजम बढ़ने से शरीर में ऑक्सीजन की मांग भी बढ़ जाती है। फेफड़ों में फैलाव होने लगता है इससे उसमें ज्यादा ऑक्सीजन समाता है व दिल भी तेजी से धड़कता है इस कारण अधिक मात्रा में ऑक्सीजनेटिड रक्स मांसपेशियों तक पहुंचता है। इसलिए नियमित चलने से शरीर की गुणवत्ता बढ़ती है इसका असर हमारे गैस्ट्रो इन्टेस्टाइनल सिस्टम पर भी पड़ता है।
लगभग 95 प्रतिशत रोगियों के मामले में घुटने का अंदरूनी भाग बाहरी भाग की तुलना में अधिक तेजी से क्षतिग्रस्त होता है। परिणामस्वरूप घुटनों के जोड़ों पर पड़ने वाला दबाव असंतुलित हो जाता है, पर यदि इस क्षति को समयपूर्ण ही रोक लिया जाए और घुटने के अंदरूनी भाग को बदल दिया जाए तो बाहरी भाग पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाएगा और घुटनों के क्षतिग्रस्त होने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाएगी। इस कारण वे जल्दी खराब होने से बच जायेगें और उनकी उम्र बढ़ जाएगी। लेकिन फिर भी रोगी को पूरी तरह से सावधानी बरतने और नियमित रूप से चिकित्सक से परामर्श लेते रहने की जिम्मेदारी निभानी जरूरी है। आखिर घुटने में इस घिसाव का कारण क्या है?
पचास वर्ष की आयु के आस-पास के व्यक्तियों और खासकर महिलाओं में होती है। इसका कारण उनका वजन ज्यादा बढ़ जाना, उठने-बैठने का गलत तरीका, कमजोर मांस पेशियां, हाई हील्स पहनना आदि जैसे कई कारण होते हैं, जिसके चलते कम उम्र में भी इस तरह की समस्या आपको ग्रस्त कर देती हैं।
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