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अमीरों को ढेर सारे दोस्त मिल जाते हैं-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख


     

      एक तरफ कुछ लोगों के पास एकदम सहजता से धन आ रहा है तो दूसरी तरफ अधिकतर लोग भारी परिश्रम के बाद भी वैसी सफलता हासिल नहीं कर पा रहे जिसकी वह अपेक्षा करते हैं। विश्व में राज्य से मुक्त अर्थव्यवस्था ने समाज में अनेक प्रकार के विरोधाभास पैदा किये हैं। कृषि, लघु उद्योग तथा व्यापार में लगे लोगों की संख्या कम होती जा रही है। अधिकतर लोग नौकरियों के लिये कंपनियों की तरफ दौड़े जा रहे हैं। एक तरह से मध्यम वर्ग का दायरा सिमट रहा है। समाज में अधिक अमीरों की संख्या नगण्य मात्रा  जबकि गरीबों की संख्या गुणात्मक रूप से बढ़ रही है।  इन दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला मध्यम वर्ग जहां संख्यात्मक दृष्टि से सिमटा है वहीं उसका आत्मविश्वास भी कम हुआ है।  वह गरीब कहलाना नहीं चाहता और अमीर बन नहीं पाता।  इतना ही नहीं अपने अस्तित्व के लिय संघर्ष कर रहे लोगों से यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि वह समाज में सामंजस्य का वातावरण बनाये।

      भौतिकवाद के चक्कर मे फंसा समाज हार्दिक प्रेम, निष्प्रयोजन मित्रता तथा आदर्श व्यवहार के भाव से परे होता जा रहा है।  देखा जाये तो हमारे देश में जिस तरह धनिकों का भंडार बढ़ने के साथ ही  ही समाज में व्यसन, अपराध तथा शोषण की प्रवृत्ति भी तेजी बढ़ती  जा रही है।  कथित आर्थिक विकास ने नैतिकता का जहां विध्वंस करने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान की धारा को अवरुद्ध कर दिया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि विभिन्न समाजों के बीच ही नहीं बल्कि उनक अंदर ही सद्भाव काम कर दिया है। लोग औपचारिक रूप से आपसी संपर्क तो रखते हैं पर हार्दिक प्रेम का नितांत अभाव है।

कविवर रहीम कहते हैं कि

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रहिमन कीन्ही प्रीति, साहब को भावै नहीं,

जिनके अनगिनत भीत, हमैं, गरीबन को गनै।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-धनियों के अनेक मित्र बन जाते हैं। उनको गरीब लोगों से मित्रता करना अच्छा नहीं लगता। बड़े लोगों को छोटे लोगों की प्रीति अच्छी नहीं लगती।

कंपनी नाम की व्यवस्था ने साहब, सचिव और सहायक का अंतर इस तरह स्थापित किया है कि लगता है कि यह कोई आधुनिक विभाजन है। विभिन्न पदों के लिये होने वाले प्रशिक्षण में यह बता दिया जाता है कि अपने से निचले स्तर के व्यक्ति के साथ समान सबंध स्थापित न करें वरना आपको अपने काम में ही परेशानी उठानी पड़ेगी।  धनिका परिवारों में भी निम्न वर्ग के लोगों को अपना अनुचर मानकर व्यवहार करने के संस्कार स्वाभाविक रूप से ही मिलते हैं।  अमीरों के अनुचर बनने वाले मध्यम और निम्न वर्ग के युवक युवतियों को यह आभास नहीं होता कि उन्हें उच्च वर्ग से हार्दिक प्रेम की आशा नहीं  करनी चाहिये।  जीवन का यथार्थ यही है कि हर बड़ी मछली छोटी को ही खा जाती है।

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