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विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा एंटीबायोटिक जागरूकता सप्ताह का शुभारंभ

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 16 नवंबर 2015 को एंटीबायोटिक : हैंडल विथ केयर विषय के साथ विश्व एंटीबायोटिक जागरूकता सप्ताह का शुभारंभ किया.
अभियान का उद्देश्य एंटीबायोटिक के अत्यधिक प्रयोग से बचने के लिए नीति निर्माताओं, स्वास्थ्य और कृषि पेशेवरों के बीच सार्वजनिक सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रोत्साहित करना है.
यह अभियान एंटीबायोटिक प्रतिरोध के बढ़ते दुरुपयोग के खिलाफ लड़ने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन  द्वारा चलाये जा रहे प्रयासों का हिस्सा है. मई 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के 68 वें विश्व स्वास्थ्य सभा का आयोजन संचार, शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से एंटीबायोटिक प्रतिरोध के विषय में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से किया गया था. एंटीबायोटिक्स क्या हैं? वस्तुतः एंटीबायोटिक्स ऐसी औषधियां हैं जिनका प्रयोग जीवाणु जनित रोगों के उन्मूलन के लिए किया जाता है. ध्यातव्य है कि सभी जीवाणु हानिकारक तथा रोगों के कारण नहीं होते हैं. जीवाणुओं से होने वाले रोगों में उपदंश, तपेदिक, साल्मोनेला और दिमागी बुखार आदि प्रमुख हैं. एंटीबायोटिक्स कैसे काम करते हैं ? प्राय: एंटीबायोटिक्स रोगों के उन्मूलन में दो तरह से कार्य करते हैं. एंटीबायोटिक्स या तो जीवाणु को समाप्त कर देते हैं या प्रतिरोथक जीवाणुओं की संख्या में इतनी वृद्धि कर देते है कि उत्पन्न जीवाणुओं  में रोग से लड़ने की क्षमता आ जाने से उसका प्रभाव नहीं होता. क्या एंटीबायोटिक्स स्वास्थ्य के लिए हमेशा लाभदायक हैं ? नहीं एंटीबायोटिक्स हमेशा स्वास्थ्य के लिए लाभदायक नहीं होते हैं. एंटीबायोटिक्स औषधियों का अतिरिक्त हानिकारक प्रभाव होता है. ये एक रोग को ठीक करने के साथ साथ एक अन्य नई बीमारी को जन्म देते हैं. उदहारण स्वरूप स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ मेडिसिन शोधकर्ताओं ने यह पाया है कि डायरिया के लिए दिए जाने वाले एंटीबायोटिक से पेट में शर्करा की वृद्धि होने के कारण हानिकारक जीवाणुओं के पनपने का खतरा रहता है जो संक्रमण का प्राथमिक कारण है. दुर्लभ मामलों में एंटीबायोटिक के प्रयोग से गुर्दे की पथरी, रक्त के थक्के,सूर्य प्रकाश से संवेदनशीलता और रक्त विकार जैसे बीमारियों के पनपने का खतरा रहता है. क्या एंटीबायोटिक प्रतिरोधक क्षमता के कारण ये समस्याएं उत्पन्न होती हैं ? नहीं एंटीबायोटिक प्रतिरोधक समस्या  के कई कारण है. यह समस्या अज्ञानता के कारण दवाओं के गलत प्रयोग, उसकी अधिक मात्रा, बीमारी के अनुसार उसका खुराक आदि की वजह से हो सकती है. साथ ही नियमित रूप से एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल से भी एंटीबायोटिक प्रतिरोध की समस्या उत्पन्न होने की संभावना होती है लेकिन हर मामलों में यह जरुरी नहीं है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कराये गये एक बहु-देशीय सर्वेक्षण के अनुसार पूरे विश्व में लगभग 76 प्रतिशत लोग एंटीबायोटिक प्रतिरोध के विषय में गलत धारणा के शिकार हैं कि एंटीबायोटिक दवाओं के प्रयोग से एंटीबायोटिक प्रतिरोधक समस्या उत्पन्न होती है. जबकि 44 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि एंटीबायोटिक दवाओं के नियमित प्रयोग के कारण यह समस्या उत्पन्न होती है. लेकिन वास्तव में यह  किसी को भी, किसी भी उम्र में तथा किसी भी देश के निवासी को एंटीबायोटिक प्रतिरोधी संक्रमण हो सकता है एंटीबायोटिक प्रतिरोध के मामले में भारत की स्थिति इस मामले में भारत की स्थिति अन्य देशों की तुलना में बेहतर नहीं है. यहां लगभग 75 प्रतिशत लोग  यही जानते हैं कि सर्दी और फ्लू का इलाज एंटीबायोटिक दवाओं से किया जा सकता है और 58 प्रतिशत लोग ही दवाओं के सही खुराक और समय के विषय में जानते हैं.
साथ ही एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक इस्तेमाल भी भारत में ज्यादा किया जाता है. 6 महीने के अंतर्गत 76 प्रतिशत लोगों ने एंटीबायोटिक दवाओं का प्रयोग किया है. निदान वस्तुतः एंटीबायोटिक प्रतिरोध दवा की निर्धारित कोर्स नहीं लेना, दवाओं के अनुचित प्रयोग, कम गुणवत्ता की दवाएं, गलत नुस्खे और निम्न स्तरीय संक्रमण रोकथाम की समस्या के कारण मुख्यतः प्रसारित होता है. इसलिए एंटीबायोटिक दवाओं का संरक्षण एक बहुमूल्य संसाधन के रूप में किया जाना चाहिए. साथ ही इसका प्रयोग प्रमाणित डॉक्टरों द्वारा बताये जाने पर निर्धारित समय और खुराक के अनुसार ही किया जाना

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